बातें

कहने को कुछ बाकी नहीं,
कुछ सुने अरसा बीत गया |
बारिश भी आती नहीं,
यूँ सूखे में ही सारा जीवन गुज़र गया |

कंकड़ पत्थर बातें करते है,
कुछ बेकार की,
कुछ बेबाक सी |

कोई तो इन्हें बताओ,
कि जिसकी आस में तुम पत्थर हुए,
वो सनम तुम्हारा,
इस दुनिया के मक्कड़ जाल में फस के रह गया |

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